SWAMI VIVEKANAND स्वामी विवेकानंद

 
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 In a conflict between the heart and the brain, follow your heart.” 
- Swami Vivekananda 
         
         भारत में विवेकानंद जी को एक देशभक्त सन्यासी के रूप में माना जाता है और उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस [ National Youth Day] के रूप में मनाया जाता है। कुछ कहानियां उनके जीवन की घटनाओं पर आधारित है , तो कुछ जन श्रुति के आधार पर। यह लेख स्वामी विवेकानंद जी के ज्ञान, व्यक्तित्व और चरित्र तथा उनके कुशाग्र बुद्धिमता का परिचय कराने वाला है। युवा सदैव स्वामी जी को अपना प्रेरणा स्रोत मानते हैं। इस कहानी को व्यक्तिगत प्रेरणा लेते हुए अपने जीवन मे अहम बदलाव ला सकते हैं।
       स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है, विश्व  में अधिकांश लोग इसलिए असफल हो जाते हैं, क्योंकि उनमें समय पर साहस का संचार नही हो पाता और वे भयभीत हो उठते हैं। यह बाते उनकी जीवन काल की घटनाओं में सजीव दिखाती है। 

अपनी संस्कृती अपनी विरासत 

           1893 में शिकागो में विश्व धर्म सम्मलेन चल रहा था। स्वामी विवेकानंद जी भी उसमें बोलने के लिए गए हुए थे। ११ सितम्बर को उनका व्याख्यान होना था। मंच के ब्लैक बोर्ड पर लिखा हुआ था- हिन्दू धर्म-मुर्दा धर्म। कोई साधारण व्यक्ति इसे देखकर अवश्य क्रोधित हो जाता, पर स्वामी जी भला ऐसा कैसे कर सकते थे। वह बोलने के लिए खड़े हुए और उन्होंने सबसे पहले “अमेरिका के बहनो और भाइयों” के साथ श्रोताओं को सम्बोधित किया। स्वामीजी के इस शब्द ने जादू कर दिया, पूरी सभा ने करतल ध्वनि [तालियोंसे ] से उनका स्वागत किया। इस हर्ष का कारण था, “स्त्रियों को प्रथम स्थान देना।” स्वामी जी ने सारी वसुधा को अपना कुटुबं मानकर सबका स्वागत किया था। भारतीय संस्कृति में निहित शिष्टाचार का यह तरीका किसी को न सूझा था। इस बात का बहुत ही अच्छा प्रभाव पड़ा। श्रोता मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते रहे। उनके लिए निर्धारित 5 मिनट कब बीत गया पता ही न चला। अध्यक्ष कार्डिनल गिबन्स ने और आगे बोलने का अनुरोध किया। स्वामीजी 20 मिनट से भी अधिक देर तक बोलते रहे। पुरे अमेरिका में स्वामी जी की चर्चा होने लगी। देखते ही देखते उनके तमाम शिष्य बन गए। अपने व्याख्यान से स्वामीजी ने यह सिद्ध कर दिया कि हिन्दू धर्म भी श्रेष्ठ है। हिन्दू धर्म में सभी धर्मों को अपने अंदर समाहित करने की क्षमता है। भारतीय संस्कृति, किसी की अवमानना या निंदा नही करती। इस तरह स्वामी विवेकानंद जी ने सात समंदर पार भारतीय संस्कृति की ध्वजा लहराई।

 Arise awake and stop not until the goal is achieved.”

शिक्षा से समाज सेवा


एक समय की बात है स्वामी विवेकानंद जी अपने आश्रम में वेदों का पाठ कर रहे थे , तभी उनके पास चार ब्राह्मण आए वह बड़े व्याकुल थे।  ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह किसी प्रश्न का हल ढूंढने के लिए परिश्रम कर रहे हैं।

चारों ब्राह्मण ने स्वामी जी को प्रणाम किया और कहा – स्वामी जी ! हम बड़ी दुविधा में हैं , आपसे अपने समस्या का हल जानना चाहते हैं। हमारी जिज्ञासाओं को शांत करें।स्वामी जी ने आश्वासन दिया और जानना चाहा। 

कैसी जिज्ञासा ? कैसा प्रश्न है आपका ?
ब्राह्मण बोले महात्मा हम चारों ने वेद – वेदांतों की शिक्षा ग्रहण की है। हम सभी समाज में अलग-अलग दिशाओं में घूम कर समाज को अपने ज्ञान से सुखी , संपन्न और समृद्ध देखना चाहते हैं। इसके लिए हमारा मार्गदर्शन करें !

स्वामी जी के मुख पर हल्की सी मुस्कान आई और उन्होंने ब्राह्मण देवताओं को कहा –

हे ब्राह्मण देव ! आप सभी यह सब लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं , इसके लिए आपको मिलकर समाज में शिक्षा का प्रचार प्रसार करना होगा। ब्राह्मण देवता शिक्षा से हमारा लक्ष्य कैसे प्राप्त हो सकता है ? स्वामी जी जिस प्रकार बगीचे में पौधे को लगाकर बाग को सुंदर बनाया जाता है , ठीक उसी प्रकार शिक्षा के द्वारा समाज का उत्थान संभव है। शिक्षा व्यक्ति में समझ पैदा करती है , उन्हें जीवन के लिए समृद्ध बनाती है। साधनों से संपन्न होने में शिक्षा मदद करती है , सभी अभाव को दूर करने का मार्ग शिक्षा दिखाती है।  यह सभी प्राप्त होने पर व्यक्ति स्वयं समृद्ध हो जाता है।

ब्राह्मण देवता को अब स्वामी विवेकानंद जी का विचार बड़े ही अच्छे ढंग से समझ आ चुका था।

अब उन्होंने मिलकर प्रण लिया वह अपने शिक्षा का प्रचार और प्रसार समाज में करेंगे यही उनकी समाज सेवा होगी।

“All power is within you, you can do anything and everything.”

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मां की महिमा 

एक बार एक जिज्ञासु ने स्वामी विवेकानन्द से पूछा, ‘संसार में माँ की महानता क्यों गाई जाती है?’ स्वामीजी ने इस पर मुस्कुराते हुए उस व्यक्ति से पूछा,’पाँच सेर का एक पत्थर ले आओ,’जब वह व्यक्ति पत्थर ले आया, तो स्वामीजी ने कहा, ‘इसे कपड़े से लपेट कर पेट पर बाँध लो और चौबीस घंटे बाद मेरे पास आओ। 

उस आदमी ने ऐसा ही किया, लेकिन कुछ घंटों में उसके लिए काम करना मुश्किल हो गया। उसे दिन में ही तारे नजर आने लगे. तब वह थका-मंदा स्वामीजी के पास आया और बोला, ‘अब मैं इस बोझ को और नहीं उठा सकता। आपने एक सवाल पूछने की इतनी बड़ी सजा मुझे क्यों दी ?’

स्वामीजी ने कहा, ‘इस पत्थर का बोझ तुमसे कुछ घंटे भी नहीं सहा गया और माँ पूरे नौ मास तक शिशु का बोझ उठाती है. इस बोझ के साथ वह सारा काम करती है और कभी विचलित नहीं होती। माँ से ज्यादा सहनशील कौन है ? इसलिए माँ की महिमा सबसे ज्यादा है। 

 “Have faith in yourselves, great convictions are the mothers of great deeds.”

 शालीनता 

स्वामी विवेकानन्द रेल के जिस डिब्बे में सफर कर रहे थे, उसी डिब्बे में कुछ अंग्रेज यात्री भी थे। उन अंग्रेजों को साधुओं से बहुत चिढ थी। वे साधुओं की बहोत निंदा कर रहे थे। उनका विचार था कि वह साधु अंग्रेजी नहीं जानता होगा। 

एक बड़े स्टेशन पर स्वामी जी के दर्शनार्थ हजारों स्वागतार्थी उपस्थित थे, जिनमें विद्वान् एवं अधिकारी भी थे।  वे अंग्रेजी में ही भाषण दे रहे थे। स्वामी जी को अंग्रेजी बोलते देखकर अंग्रेज स्तब्ध रह गये और अवसर मिलने पर नम्रतापूर्वक पूछने लगे कि ‘आपने हम लोगों की बातें सुनीं और बुरा माना होगा। 

स्वामी जी ने अपनी सहज शालीनता से कहा, ‘मेरा मस्तिष्क अपने ही कार्यों में इतना अधिक उलझा हुआ था कि आप लोगों की बातें सुनते हुए भी उन पर ध्यान देने और उनका बुरा मानने का अवसर ही नहीं मिला।

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''You are the creator of your own destiny.”

मनुष्य जाति की सेवा

बी.ए. पास करने के बाद स्वामी विवेकानन्द ने  एल.एल.बी. किया. इसी समय उनके पिता की मृत्यु हो गई. पूरे परिवार का भार उनके ऊपर था, लेकिन वह सन्यास लेने का विचार के रहे थे जब उन्होंने यह बात स्वामी रामकृष्ण परमहंस को बताई तो उन्होंने कहा, ‘यह स्वार्थ भरा विचार छोड़ दो अपनी मुक्ति की चिंता मत करो. इस संसार में लाखों लोग दुखी हैं. उनका दुख कम करो। भटके हुए समाज को सही रास्ता दिखाओ।  लोक-कल्याण से बढकर कोई दूसरा कार्य नहीं है। 

अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस की बातों का स्वामी विवेकानन्द कर घर प्रभाव पड़ा. वह जीवनपर्यन्त लोगों की सेवा में लगे रहे एक बार उन्होंने कहा था, दुख में फँसे मनुष्यों को मुक्त करना और मनुष्य जाति की सेवा करना ही सन्यासी का सच्चा धर्म हैं। 

“You cannot believe in god until you believe in yourself.”

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